हिपर सल्फर के लाभ, इस्तेमाल कैसे करें, लक्षण – Hepar Sulphur Uses, benefits, Antidote in Hindi

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हिपर सल्फर के लाभ, लक्षण तथा मुख्य-रोग

     ( Hepar Sulphur Uses, Benefits In hindi )

ठंडी हवा न सह सकना; छूने से दर्द बढ़ना; तथा मानसिक असहिष्णुता – यह दवा सल्फर और कैलकेरिया के मेल से बनी है, इसलिये इसका नाम सल्फ्यूरिस कैलकेरियम भी है, और इसलिये जैसा हम आगे देखेंगे इसमें दोनों के गुण मौजूद हैं। इसका यह मतलब नहीं कि इसकी अपनी विशेषताएं नहीं हैं, वे तो हैं ही, परन्तु सल्फर और कैलकेरिया दोनों के गुण भी इसमें आ जाते हैं। कैलकेरिया शीत-प्रधान दवा है, हिपर भी शीत-प्रधान है। सर्दी में तो हरेक को गर्म कपड़े की जरूरत पड़ती है, परन्तु यह रोगी गर्मी में भी अपने को कपड़े से ढके रखता है। दूसरे लोग कमरे में जितनी गर्मी बर्दाश्त कर सकते हैं, उस से कहीं अधिक गर्मी यह बर्दाश्त कर सकता है। दरवाजे और खिड़कियां बन्द रखता है। अपने ही कमरे की नहीं, अपने घर के साथ के कमरों के दरवाजे और खिड़कियां बन्द किया करता है। सर्दी बर्दाश्त कर ही नहीं सकता। सोते हुए कहीं से भी ठंडी हवा न घुस सके, इसका ध्यान रखता है।

एक स्त्री जिसके गुर्दों में सूजन था, सब तरह के इलाज करा कर जब वह हार गई। यह स्त्री गर्म कम्बलों से खुद को अच्छे से ढकी हुई थी, परन्तु उसने डाक्टर को कहा कि मुझे ऐसा लगता है जेसे ठंडी हवा मेरी टांगों में घुसी जा रही हो, इसलिये मैं इतना कम्बल लपेटे रहती हूं। यहाँ गुर्दों की बीमारी से हिपर का कोई सम्बन्ध नहीं दीखता था, तो भी सिर्फ इस लक्षण पर उसे हिपर 200 दिया गया, और वह भली-चंगी हो गई। ठंडी हवा न सह सकना इसका चरित्रगत लक्षण है।

छूने से दर्द बढ़ना – जैसे रोगी ठंडी हवा को नहीं सह सकता, वैसे छूने को भी नहीं सह सकता। हर प्रकार की असहनशीलता इसमें पायी जाती है। अगर शरीर में कहीं सूजन हो, फोड़े हों या त्वचा में कहीं फुसियां हों, तो रोगी उन्हें छूने नहीं देता, ठंडी हवा का उस पर स्पर्श भी नहीं होने देता। दूसरे लोग जिस दर्द को साधारण समझ कर उधर ध्यान भी नहीं देते, उस दर्द में वह चीखने लगता है, थोड़े-से दर्द में बेहोश हो जाता है – इस हद तक उसमें सहनशीलता का अभाव होता है। शरीर में कहीं सूजन हों, कहीं फोड़ा-फुंसी हो, न वह उन्हें छूने देता है, न उस दर्द को सह सकता है।

मानसिक-असहिष्णुता – ठंड को न सहना, स्पर्श को न सहना, दर्द को न सहना, इतने पर ही बस नहीं होता। रोगी की मानसिक-अनुभूति भी ऐसा ही होती है। सामान्य-कारण से भी बहुत अधिक क्रोध आ जाता है, झगड़े के लिये तैयार रहता है, उत्तेजित हो जाता है। बिना कारण के अपने मित्र तक को मारने के लिये उतावला हो जाता है। नाई हजामत करते हुए उस्तरे से गला काटने की सोचने लगता है। अपने को आग से जला डालने के विचार आने लगते हैं। जब ऐसे लक्षण बढ़ने लगते हैं तब पागलपन का रूप धारण कर लेते हैं। सब जगह आग लगाते फिरना, निर्दोष व्यक्तियों की जान ले लेना इसी मनोवृत्ति का परिणाम है। हिपर इस प्रकार की मनोवृत्ति को बदल देता है।

इस दवाई के बहुत ही महत्वपुर्ण मानसिक रुब्रिक सामने आये हैं। जब हमने इन मानसिक रुब्रिक पर इस दवाई का इस्तेमाल किया तो आश्चर्यजनक नतीजे प्राप्त हुए। उस औरत ने कहा, “मुझे गुस्सा बहुत आता है” । इतना गुस्सा कि दिल करता है खुद भी मर जाऊँ और बच्चों को भी मार दूं। घबराहट की वजह से अपनी जान लेने को मन करता है। सारा दिन परिवार की चिन्ता ही लगी रहती है। गरीब हूं यही चिन्ता रहती है कि आगे का क्या होगा। सारी सारी रात नींद नहीं आती। जब से शादी हुई है खुशी तो कभी देखी ही नहीं।

महत्वपूर्ण रुबरिक्स :

  • Delusion poor she is
  • Anxiety family about
  • Anxiety future about
  • Rage kill people tries to
  • Impulse kill beloved one
  • Anguish attempts to suicide
  • Wrong every thing seems

हमने दवाई को कई और केसों में भी इस्तेमाल किया और अच्छे नतीजे मिले।

Keynotes Of Hepar Sulphur

  • ठंडी हवा सहन नहीं होता
  • रोगी को छूने से दर्द बढ़ जाता है
  • घाव में सड़े पनीर सी बू वाला मवाद निकलता है
  • दस्त से खट्टी बू आती है
  • आचार, खट्टी चीजें आदि खाने की इच्छा रहती है

(1) ठंडी हवा न सह सकना; छूने से दर्द बढ़ना; तथा मानसिक असहिष्णुता – यह औषधि सल्फर और कैलकेरिया के मेल से बनी है, इसलिये इसका नाम सल्फ्यूरिस कैलकेरियम है, और इसलिये जैसा हम आगे देखेंगे इसमें दोनों के गुण मौजूद हैं। इसका यह अभिप्राय नहीं कि इसकी अपनी विशेषताएं नहीं हैं, वे तो हैं ही, परन्तु उक्त दोनों के गुण भी इसमें आ जाते हैं। कैलकेरिया शीत-प्रधान दवा है, हिपर भी शीत-प्रधान है। सर्दी में तो हरेक को गर्म कपड़े की जरूरत पड़ती है, यह रोगी गर्मी में भी अपने को कपड़े से ढके रखता है। दूसरे लोग कमरे में जितनी गर्मी बर्दाश्त कर सकते हैं, उस से कहीं अधिक गर्मी यह बर्दाश्त कर सकता है। दरवाजे और खिड़कियां बन्द रखता है। अपने ही कमरे की नहीं, अपने घर के साथ के कमरों के दरवाजे और खिड़कियां बन्द किया करता है। सर्दी बर्दाश्त कर ही नहीं सकता। सोते हुए कहीं से भी ठंडी हवा न घुस सके, इसका प्रबन्ध कर लेता है। डॉ० जे० एम० सेल्फूरिज लिखते हैं कि एक स्त्री जिसके गुर्दों में शोथ था, सब तरह के इलाज करा कर जब वह हार गई, तब उन्हें बुलाया गया। यह स्त्री गर्म कम्बलों से खूब ढकी हुई थी, परन्तु उसने डाक्टर को कहा कि मुझे ऐसा लगता है जेसे ठंडी हवा मेरी टांगों में घुसी जा रही हो, इसलिये मैं इतना कम्बल लपेटे रहती हूं। यद्यपि गुर्दों की बीमारी से हिपर का कोई सम्बन्ध नहीं दीखता था, तो भी सिर्फ इस लक्षण पर उसे हिपर 200 दिया गया, और वह भली-चंगी हो गई। ठंडी हवा न सह सकना इसका चरित्रगत लक्षण है।

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छूने से दर्द बढ़ना – जैसे रोगी ठंडी हवा को नहीं सह सकता, वैसे छूने को भी नहीं सह सकता। हर प्रकार की असहनशीलता इसमें पायी जाती है। अगर शरीर में कहीं शोथ हो, फोड़े हों या त्वचा में कहीं फुसियां हों, तो रोगी उन्हें छूने नहीं देता, ठंडी हवा का उस पर स्पर्श भी नहीं होने देता। दूसरे लोग जिस दर्द को साधारण समझ कर उधर ध्यान भी नहीं देते, उस दर्द में वह चीखने लगता है, थोड़े-से दर्द में बेहोश हो जाता है – इस हद तक उसमें सहनशीलता का अभाव होता है। शरीर में कहीं सूजन हों, कहीं फोड़ा-फुंसी हो, न वह उन्हें छूने देता है, न उस दर्द को सह सकता है, उसे दर्द ऐसे महसूस होता है जैसे सूइयां चुभ रही हों, खप्पच उनमें धंसे जा रहे हों।

मानसिक-असहिष्णुता – ठंड को न सहना, स्पर्श को न सहना, दर्द को न सहना, इतने पर ही बस नहीं होता। रोगी की मानसिक-अनुभूति भी असहिष्णुतामयी होती है। सामान्य-कारण से बहुत अधिक क्रोध आ जाता है, झगड़े के लिये तैयार रहता है, उत्तेजित हो जाता है। यह चित्त-विकार उसे इस कदर दबोच लेता है कि बिना कारण के अपने मित्र तक को मारने के लिये उतावला हो जाता है। नाई हजामत करते हुए अपने अभिभावक का उस्तरे से गला काटने की सोचने लगता है। अपने को आग से जला डालने के विचार आने लगते हैं। जब ऐसे लक्षण बढ़ने लगते हैं तब पागलपन का रूप धारण कर लेते हैं। सब जगह आग लगाते फिरना, निर्दोष व्यक्तियों की जान ले लेना इसी मनोवृत्ति का परिणाम है। हिपर इस प्रकार की मनोवृत्ति को बदल देता है।

(2) फोड़ों के लिये सर्जरी का काम करना; (हिपर, साइलीशिया, मर्क सॉल की फोड़े या सुखाने में तुलना) – प्राय: समझा जाता है कि होम्योपैथी में सर्जरी के लिये कोई दवा नहीं है, परन्तु ऐसी बात नहीं हैं हिपर को होम्योपैथी की नश्तर कहते हैं। यह होम्योपैथी का सर्जन है। अनेक फोड़े या अनेक रोग जिनका इलाज सिर्फ चीरा-फाड़ी समझा जाता है हिपर से ठीक हो जाते हैं। जैसे केलकेरिया का अंश होने के कारण हिपर शीत-प्रधान है, वैसे सल्फ़र के कारण इसका फोडे-फुसी पर प्रभाव है।

फोड़ा सुखाने के लिये उच्च-शक्ति, फोड़ने के लिये निम्न-शक्ति पर विचार – डॉ० फैरिंगटन का कथन है कि जब फोड़े में तपकन हो रही हो, फोड़े में दर्द हो, ऐसा प्रतीत हो कि सूजन हो गई है, तब उच्च-शक्ति का हिपर देने से सब कुछ जाता रहेगा, फोड़ा दब जायगा। अगर चिकित्सक समझे कि फोड़े को पकाना और फोड़ना जरूरी है, तो हिपर निम्न-शक्ति देना चाहिये। डॉ० ऐलन और डॉ० नौरटन का भी यही विचार है। परन्तु डॉ० क्लार्क, डॉ० नैश इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनका कथन है कि उच्च शक्ति का हिपर दे देना चाहिये, और अगर शारीरिक-प्रकृति के लिये फोड़े का सूख जाना अभिप्रेत होगा, तो फोड़ा अपने-आप सूख जायेगा, अगर उसका पकना और फूट जाना अभिप्रेत होगा, तो वह अपने आप पक जायगा और फूट जायगा। डॉ० नैश ने एक रोगी का उल्लेख किया है जिसे उन्होंने हिपर C.M. दिया और फोड़ा सूखने के बजाय पक गया और फूट गया; डॉ० क्लार्क ने एक रोगी के बगल के एक फोड़े का उल्लेख किया है जिसमें पस पड़ चुकी थी, परन्तु उसे उन्होंने हिपर 6 दिया और फोड़ा पकने और फूटने के स्थान में सूख गया। इससे यह परिणाम निकलता है कि फोड़े के सम्बन्ध में यह देखना चाहिये कि रोगी की सर्दी के प्रति और स्पर्श के प्रति क्या प्रतिक्रिया है, उच्च और निम्न शक्ति का उसे सुखाने या पकाने पर कोई विशेष प्रभाव नहीं है। फोड़े की प्रकृति फूटने की होगी, तो उच्च-शक्ति के देने पर भी वह फूट जायेगा, सूखने की होगी तो निम्न-शक्ति के देने पर भी वह सूख जायेगा।

हिपर, साइलीशिया तथा मर्क सॉल की फोड़े के फोड़ने या सुखाने में तुलना – फोड़े पर जैसे हिपर का प्रभाव है, वैसे ही साइलीशिया का प्रभाव है। इन दोनों औषधियों में इतनी समानता है कि इन दोनों में से कौन-सी औषधि दी जाय, यह निर्णय करना कठिन हो जाता है। दोनों में त्वचा गंदी होती है, फोड़े-फुंसी ठीक होने के बजाय उससे पस रिसते रहते हैं, दोनों में गले में खप्पच चुभने का सा अनुभव होता है यद्यपि हियर में यह ज्यादा है, दोनों में जरा-सी भी चोट पक जाती है, दोनों शीत-प्रधान हैं, परन्तु इससे आगे दोनों के लक्षण अलग-अलग हो जाते हैं। हिपर गर्म और नमीदार मौसम में आराम अनुभव करता है, साइलीशिया नमीदार मौसम में परेशान हो जाता है। यद्यपि दोनों में पसीना बेहद पाया जाता है, तो भी साइलीशिया के रोगी को रात को सिर पर बेहद पसीना आता है, पांवों पर बदबूदार पसीना आता है, परन्तु हिपर के पसीने में खट्टी बू आती है, और इसका पसीना दिन और रात दोनों समय आता है। इन दोनों औषधियों में ग्रन्थियों का शोथ एक समान है, परन्तु हिपर का ग्रन्थि-शोथ एकदम होता है, वेग से होता है, साइलीशिया का ग्रन्थि-शोथ धीरे-धीरे होता है और अगर रोगी को साइलीशिया न दिया जाय, तो उसे आराम होने में बहुत देर लग जाती है। हिपर का मवाद गन्दा, मलाई के से रंग का होता है, साइलीशिया का मवाद पतला, रुधिर मिला हुआ होता है। डॉ० फैरिंगटन का कथन है कि फोड़े में पहले हिपर देने की अवस्था आती है, बाद को साइलीशिया की। हिपर में जो स्पर्श के प्रति असहिष्णुता पायी जाती है, वह साइलीशिया में नहीं है। मर्क, हिपर, साइलीशिया – इस क्रम को ध्यान में रखना चाहिये-अगर फोड़े के लिये मर्क दिया जा चुका है, तो उसके पीछे साइलीशिया नहीं देना चाहिये। जब मर्क का प्रभाव चल रहा हो तब साइलीशिया का प्रभाव नहीं होता, गड़बड़ हो जाती है। ऐसी हालत में मर्क के बाद हिपर देना चाहिये, और हिपर के बाद साइलीशिया दिया जा सकता है क्योंकि मर्क के बाद हिपर अच्छा काम करता है। जब फोड़ों में मर्क दिया जाय, तब औषधियों का क्रम मर्क, हिपर, साइलीशिया यह होना चाहिये।

(3) जुकाम; आंख आना; कान पकना; मूत्राशय का शोथ, दस्त – इनमें सड़े पानी की-सी बू का मवाद निकलना; खट्टी बू आना – जैसे हिपर का फोड़े-फुन्सियां पर प्रभाव है, वैसे ही इसका शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों की श्लैष्मिक-झिल्लियों की शोथ पर भी प्रभाव है। इसी कारण यह जुकाम, आंख आना, कान पकना, मूत्राशय का जख्म, आंतों की शोथ के कारण दस्त आदि को ठीक करता है।

ठंडी हवा में जाने से जुकाम का पुराना हो जाना – इस औषधि का प्रकृतिगत-लक्षण ठंडी हवा को न सह सकना है। पुराने जुकाम में, जो हर बार रोगी के ठंडी हवा में जाने से उस पर आक्रमण कर देता है, नाक बन्द हो जाती है, रोगी कहता है कि जब भी मैं ठंड में जाता हूँ जुकाम नये सिरे से मुझे आ घेरता है, मानो हर ठंडे सांस से जुकाम आ जाता है, गर्म कमरे में आने से उसे चैन पड़ता है, इस प्रकार के जीर्ण जुकाम को यह ठीक कर देता है। ठंड लगने से छींकें आने लगती है, नाक बहने लगता है, पहले पनीला स्राव निकलता है, अंत में गाढ़ा, पीला, बदबूदार हो जाता है।

ठंड से आंख आना, आँख की शोथ, आँख से गाढ़ा पस जाना – आँख से बदबूदार, गाढ़ा, पस-मिश्रित स्राव जाना, अांख का शोथ जिसमें छोटे-छोटे अल्सर हों, आँख के भीतर अल्सर, रक्त-मिश्रित पस, आँख का लाल हो जाना, पलकें सूज जाना, आंख के किनारों का पलट जाना, उनमें जख़्म हो जाना आदि इसमें पाया जाता है। अगर आँख के रोगों में हिपर के चरित्रगत-लक्षण मौजूद हों, ठंड से रोग बढ़े खट्टी बू का स्राव निकले – तो यह औषधि उपयुक्त होगी। अगर आंख के लक्षण अस्पष्ट भी हों, परन्तु हिपर के चरित्रगत-लक्षण मौजूद हों, तो यह औषधि लाभ करेगी क्योंकि औषधि के निर्वाचन में मुख्य बात औषधि के व्यापक-लक्षण हैं, चरित्रगत-लक्षण हैं, एकांगी लक्षण नहीं।

ठंड से कान पकना, खट्टा, बदबूदार, पनीर के रंग का-सा मवाद आना – ठंड से कान के भीतर के भाग में शोथ हो जाती है, वहा जख्म बन जाता है, कान का पर्दा फट जाता है, कान में असहनीय पीड़ा होती है, खून मिला स्राव निकलता है। पहले ऐसा लगता है कि कान बन्द हो गया, बाद को कान में बोझ-सा महसूस होता है, फिर कान का पर्दा फट जाता है, पस निकलती है, गाढ़ा स्राव निकलता है जिसमें पनीर के से टुकड़े होते हैं, सड़े हुए पनीर की बू आती है और रोगी से खटास की गन्ध निकलती है। इनमें हिपर लाभ करता है।

मूत्राशय का शोथ – जिन रोगियों की शीत-प्रकृति होती है, मूत्राशय में से गाढ़ा, सफेद, पनीर के से ढंग का स्राव निकलता है, मूत्र-प्रणालिका में खप्पच की-सी चुभन होती है-स्मरण रहे कि ये सब हिपर के चरित्रगत लक्षण हैं – उनके मूत्राशय की शोथ में यह औषधि लाभ करती है। मूत्राशय की इस प्रकार की शोथ गोनोरिया में पायी जाती है। मूत्राशय में जख़्म हो जाते हैं, पेशाब वेग से नहीं निकलता, मूत्राशय में मूत्र को वेग से निकालने की शक्ति नहीं रहती, बहुत हल्की धारा निकलती है, या पेशाब बूंद-बूंद कर के जाता है, और पुरुष में मूत्र की धार आगे को न जाकर सीधी नीचे गिरती है।

दस्त – इस औषधि में बच्चों के दस्त में खदटी बू आती है; दस्त पतले होते हैं, उनका रंग सफेद होता है। खट्टी बू इसका चरित्रगत लक्षण है। कैलकेरिया कार्ब, रिउज तथा मैग्नेशिया कार्ब में भी खट्टी बू का लक्षण है, परन्तु हिपर के दस्तों में खट्टी बू के साथ वे सफेद होते हैं।

(4) गले में, मूत्राशय में या कहीं खप्पच की-सी अनुभूति (टांसिल; गोनोरिया) – इस औषधि का एक विशेष लक्षण यह है कि रोगी को गले में, या मूत्राश्य में, या मल-द्वार में या कहीं भी खप्पच की-सी गले में कांटा या सुई चुभने की-सी अनुभूति होती है। ऐसा प्राय: सिफिलिस के कारण टांसिलों के रूप में गले में, या गोनोरिया के कारण मूत्र-नली में, या बवासीर के कारण मल-द्वार में हो सकता है। यह लक्षण अर्जेन्टम नाइट्रिकम तथा नाइट्रिक ऐसिड में भी पाया जाता है। अर्जेन्टम में सारे गले में कांटे हो जाते हैं। जैसे व्याख्याताओं, गायकों के गले में पाये जाते हैं, बोलते-बोलते गला पक जाता है, सारे गले में दर्द होने लगता है। अर्जेन्टम का रोगी मीठा बहुत पसन्द करता है, हिपर का रोगी अचार, चटनी, खटाई पसन्द करता है। नाइट्रिक ऐसिड के रोगी के पेशाब में घोड़े के पेशाब की-सी बू आती है।

टांसिल की कुछ मुख्य-मुख्य औषधियां

Tonsil ki Homeopathic Dawa

एकोनाइट – शुरू-शुरू में ठंड लगने से टांसिल का शोथ हो जाना।

बैराइटा कार्ब – अगर एकोनाइट के बाद पता चले कि रोग कुछ बढ़ा हुआ है।

बेलाडोना – टांसिल में तेज बुखार, ज्यादा सूजन, लालिमा, सिर-दर्द।

मर्क विवस – टांसिल दायें या बायें किसी भी तरफ हो, बदबूदार सांस, गीली जीभ जिस पर दांतों के निशान पड़ जायें, पसीना आये परन्तु पसीने से आराम न मिलें।

मर्क प्रौटो आयोडाइड – मर्क विवस के ही लक्षण परन्तु टॉसिल दायीं तरफ शुरू होता है, जीभ तालु की तरफ गहराई में गाढ़े पीले रंग की होती है।

लैकेसिस – टांसिल बायीं तरफ से शुरू होता है, फिर दायीं तरफ जा सकता है। नींद के बाद रोगी की तकलीफ बढ़ जाती है।

लाइकोपोडियम – टांसिल दाईं तरफ से शुरू होता है, फिर बाईं तरफ जा सकता है।

लैक कैनाइनम – टांसिल एक दिन दाईं तरफ, फिर बाईं तरफ आता जाता रहता है।

फाइटोलैक्का – अगर गले की श्लैष्मिक झिल्ली में छाले से पड़ जायें।

हिपर सल्फ – जब अन्य सब दवाओं के देने के बाद भी ऐसा पता चले कि टांसिल पकेगा, उसमें पस पड़ जायेगी, तब दिया जाता है।

बैसीलीनम – इस रोग में सप्ताह में एक बार 200 शक्ति दे देना लाभ करता है।

(5) त्वचा के रोग – त्वचा के जोड़ों में फुन्सियां होना – त्वचा के रोगों में हिपर का प्रयोग तब किया जाता है जब जरा-सी चोट लगे और पस पड़ जाय। डॉ० गुएरेन्सी का कथन है कि जहाँ-जहाँ जोड़े हैं, बांहों में, बगल में, घुटनों के पीछे, वहां-वहां फुन्सी हो जाना इस औषधि की विशेषता है। जननेन्द्रिय, अण्डकोश, जांघों के बीच नमीदार फोड़े-फुंसी में जब अत्यधिक स्पर्शानुभूति हो, तब इसका प्रयोग करना चाहिए।

(6) आचार, खट्टी चीजों आदि की इच्छा (अजीर्ण-रोग) – वैसे तो अजीर्ण-रोग में इसका प्रयोग बहुत कम होता है, परन्तु एक ऐसा भी अजीर्ण है जिसमें यही काम कर सकता है। जब रोगी को अम्ल चीजों के खाने की उत्कट-इच्छा हो, खट्टी-चीजें, अचार-चटनी के लिये, शराब के लिये वह परेशान रहता हो, खाने के बाद रोगी को ताकत तो आ जाती हो। परन्तु पेट भारी हो जाता हो, भोजन–प्रणालिका से खट्टा पानी बार-बार ऊपर को आता हो, कभी-कभी उल्टी भी हो जाती हो, खाने के कुछ घंटे बाद पेट फूल जाता हो, पेट का कपड़ा ढीला करना पड़ता हो, इन लक्षणों के साथ कभी कब्ज कभी दस्त आ जाते हों, नर्म मल भी कठिनाई से निकलता हो, तब यह औषधि अजीर्ण (बदहज़मी) को ठीक कर देती है।

(7) ज्वर की शीतावस्था में ददोड़े पड़ जाना – ज्वर की शीत-अवस्था में शरीर में ददोड़े पड़ जाते हैं, उनमें खुजली और जलन होती है, और गर्मी की अवस्था आने पर ये ददोड़े समाप्त हो जाते हैं। शीत-अवस्था के समाप्त हो जाने पर ददोड़े निकल आना एपिस का लक्षण है। एपिस के ज्वर में रोगी को खट्टा, बदबूदार पसीना आता है।

हिपर सल्फर औषधि के अन्य लक्षण

(i) सारी रात पसीने से तर हो जाना – इस औषधि के अनेक रोगों में सारी रात पसीना आने का लक्षण पाया जाता है। खांसने पर, या जरा-से परिश्रम से रोगी पसीने से तर हो जाता है।

(ii) प्रदर में बेहद खट्टी बू आना – रोगिणी को इतना प्रदर-स्राव होता है कि उसे नैपकिन का प्रयोग बार-बार करना पड़ता है। प्रदर बदबूदार, सड़े पनीर की-सी गंध का होता है। नैपकिन स्राव से इतना भीग जाता है कि उसे हटा कर धोना पड़ता है, उसकी बदबू से कमरा भर जाता है। इतनी बदबू आती है कि रोगिणी के कमरे में घुसते ही कमरा बदबू से भर जाता है और एकदम कहा जा सकता है कि उसे यह रोग है।

(iii) शरीर में से विजातीय-पदार्थ को निकाल देने की शक्ति – अगर शरीर में सूई टूट जाय या गोली आदि कोई विजातीय पदार्थ आ जाय, तो हिपर या साइलीशिया से वह सहज निकल जाता है। अगर फेफड़ों में गोली अटक जाय, तो इन दवाओं को नहीं देना चाहिये क्योंकि जहां गोली पड़ी होती है वहां वह चारों तरफ से तन्तुओं से घिर जाती है, और कोई नुकसान नहीं पहुंचाती। इन दवाओं से उसका घेरा टूट सकता है और गोली निकलती हुई फेफड़े को नुकसान पहुंचा सकती है।

(iv) नम-मौसम में दमे में आराम – डॉ० नैश का कहना है कि नम मौसम में दमे में आराम होने में हिपर जैसी दूसरी कोई औषधि नहीं है। हिपर के दमे में नम-मौसम में रोगी को आराम रहता है। पुराने दमें में हिपर सल्फ और नैट्रम सल्फ़ – इन दोनों दवाओं से लाभ होता है, परन्तु इनमें भेद यह है कि हिपर का दमा खुश्क, ठंडी हवा से बढ़ता है, नम हवा से ठीक रहता है; नैट्रम सल्फ का दमा डलकेमारा की तरह का होता है, हिपर से उल्टा, वह खुश्क, ठंडी हवा में ठीक रहता है, नम हवा में रोग बढ़ जाता है।

(v) हिपर सल्फ, कैलि सल्फ़, कैलकेरिया सल्फ़ की तुलना – डॉ० फौस्टर का कथन है कि कैलि सल्फ़ का प्रभाव शरीर की बाहरी त्वचा (Epidermis) पर होता है, हिपर सल्फ़ और कैलकेरिया सल्फ़ का प्रभाव शरीर की अन्दर की त्वचा पर होता है, अन्दर की त्वचा, अर्थात् फोडे-फुसी पर। इन दोनों में भी फोड़ा खुलने से पहले हिपर का क्षेत्र है, फोड़ा खुल जाने के बाद कैलकेरिया सल्फ़ का क्षेत्र है। हिपर फोड़े को फोड़ दे तो कैलकेरिया सल्फ़ उसे भर देगा।

(8) हिपर सल्फ का सजीव तथा मूर्त-चित्रण – रोगी ठंड से परेशान होता है, हर अंग को कपड़े से लपेटे रहता है, दरवाजे खिड़कियां-झरोखे बन्द कर देता है, इस बात से घबराया रहता है कि सेाते समय न जाने कहां से ठंडी हवा आ रही है। फोड़े-फुंसी से त्वचा गन्दी मैली रहती है। फोड़े की जरा-सी भी शोथ को बर्दाश्त नहीं कर सकता। फोड़े को कोई छू दे, तो चीख उठता है। थोड़ी सी चोट भी पक जाती है। शरीर से पसीना छूटता है, खट्टी बू आती है, भिन्न-भिन्न अंगों से बदबूदार सड़े पनीर का-सा स्राव निकलता है, और खट्टी बदबू से मकान भर जाता है। सहनशीलता का उसमें अभाव होता है, किसी की बात सह नहीं सकता। ठंड से परेशान परन्तु नम मौसम में तबीयत ठीक रहती है। खाने में उसे खट्टी चीजों, अचार-चटनी का शौक होता है। ऐसा है सजीव तथा मूर्त-चित्रण हिपर सल्फ़ का।

Antidote Of Hepar Sulphur – Belladonna, Chamomilla & Silicea

(9) शक्ति तथा प्रकृति – 3, 6, 200 या ऊपर। निम्न-शक्ति फोड़ा फोड़ देती है, उच्च-शक्ति सुखा देती है, डॉ० नैश इस बात से सहमत नहीं है। औषधि ‘सर्द-प्रकृति के लिये है।

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